Saturday, January 16, 2010

Second Opinion: मैं हूँ मानवी

Second Opinion: मैं हूँ मानवी

Monday, January 11, 2010

Second Opinion: मैं हूँ मानवी

Second Opinion: मैं हूँ मानवी

Thursday, October 16, 2008

Argala Magazine

We are about to release the first issue of a Hindi magazine called "Argala" ( www.argala.org ). It will be online for first few months and later from January 2009 onwards we will go for print issue. We are very much in favour of contributions from young people specially who are less than 30 years old or don't have any publication history. All other contributions are by invitation only. We welcome all kind of contribution related to Hindi literature such as, Kavita, Kahani, Lekh, Sameeksha or anything which suggest how to promote Hindi or Hindi literature. There is one column which is dedicated to Translated articles from other languages to Hindi.

In the first issue of Argala some of the highlights are, Interview of India's biggest award in literature ie Sahitya Academy Award winner Amarkant, Interview of Dr. Soumyabrata Chowdhury, a famous theater director and writer, article of Late Acharya Ramchandra Shukla and a few contributions from some of the most famous personalities in this field - Dr. Varyam Singh, Dr. Ganga Prasad Vimal, Dr. Anand Kumar and Dr. Devendra Chowbey.

Hoping to hear from you soon.

Regards,

Anil Pushker Kaveendra

Member, Editorial Board

Argala

Thursday, December 6, 2007

Andon se choojon ki chaah mein (अण्डों से चूजों की चाह में)

पत्ते निश्चिंत हैं
फूल निश्चिंत हैं
शाखें निश्चिंत हैं

जड़ें गहरी चिंता में डूबती जा रही हैं
तने की छाल छूट रही है
भीतर शुष्कता की दीमक चूस गयी सांद्रता

हल्का सा हवा का झोंका आते ही
थरथराता हुआ दरख्त चड़चड़ाने लगता है

आक्रोश में दबी चीख किसी को सुनायी नहीं देती
परिंदों की दस्तक कंपकंपा देती है

दरख्त में अब भी
कुछ परिंदों के घोसले, अँडे
पीली कुम्हलायी पत्तियों में सुरक्षित हैं

और कितनी बार
अँडों से निकलने वाले चूजों की चाह में
वो ज़िन्दा रहेगा

Maa.n ka sapnaa (माँ का सपना)

हर औरत माँ बनने के पूर्व
कुछ सपने बुनती है
( समय बीतते देर कहाँ लगती है)

कुछ समय बाद
माँ बच्चे के साथ साथ सपना
पूरा करने की खतिर उसकी
नाप लेती उसे सुंदर बुनावट, आकार
देती है

एक समय ऐसा आता है
जब बच्चा सपने की झिल्ली काटकर
अचानक इतना बड़ा हो जाता है कि
वह माँ को सपनों का भरा पूरा
आकाश दिखाता है, माँ हमेशा से
हकीकत के दायरे से बाहर सपने के
भीतर जीने की आदी हो चुकी है

और आखिरकार
बच्चा माँ को धीरे से सपनों का
जादू दिखाकर एक दिन कब्र में
दफनाकर चला आता है

दुनिया समझती है
दोनो को एक - दूसरे से बेहद प्यार था
माँ का सपना हमेशा हमेशा को चुक जाता है

Aakhri baar (आखिरी बार)

पहला प्यार
एक बार - सौ बातें
हजार शर्तें लेकर आता है
आदमी बेबस हो जाता है

मैंने
तुम्हे प्यार किया
बंद दरवाजों से चौराहे तक
तुम मुझे ले आयी

प्यार परवान चढ़ता तब
जब सौ बातें
हजार शर्तें होती

हम चुप ही रहे
हमने प्यार किया
प्यार की तरह
तुम मेरी सांसों मे जीती रही
मैं तुम्हारी आंखों मे बसता रहा

दूसरी बार
तुम मेरी अंगुलियां पकड़े थी
मै तुम्हारे होंठों से चिपका रहा

तीसरी बार
तुम मेरे रोम रोम मे समा गयी
मैं तुम्हारी देह में घुलता रहा

इस तरह
प्यार हम दोनों के बीच सीमित
रहकर फैलता रहा

इस बार
तुमने मुझे कोख दी
मैं तुम्हारी नस नस चूसता रहा

आखिरी बार
इस तरह प्यार किया
सौंप दिया सब कुछ

तुमने मुझे
एक बार फिर
प्यार करने की इजाजत दी
खुद को मिटा दिया
मेरे लिये

Thursday, April 12, 2007

Hamaari bhaasha mein jise pyaar kehte hain (हमारी भाषा में जिसे प्यार कहते हैं) - 1

हर कोई बच्चे को
सिखाना चाहता है नाम
बच्चा उसे दोहराते हुये
उच्चारण करता है

सभी उसकी गलतियों को
भूल जाते हैं मुआफी के लिहाज से

रटे रटाये शब्दों से ही वो
निकालता है अपना काम
गिने चुने नामों से ही छाँटकर
रख लेता है एक नाम
जिसमें ज्यादा से ज्यादा सुविधा
और छिपा होता है फायदा

हमारी भाषा में जिसे प्यार कहते हैं
वह बच्चे की मासूम चतुर दुनिया है

जिस तरह लाटरी लेकर ग्राहक
नंबर भूलने की गलती नहीं करता
बच्चा मीठी सेवैंया खाकर
उसका स्वाद नहीं भूलता

बच्चे हमारी दुनिया से
बिलकुल अलग हैं
बेहद खुश उत्कंठित
सादगी से भरपूर जिज्ञासु

अक्सर हम उनकी दुनिया में
अपनी इच्छाओं के रंग भरते हैं

बच्चा कच्चे दूध सा
पवित्र होता है
जिसे हम खीर बनाने की चेष्टा करते हैं

ज़रा सा संतुलन बिगड़ते ही
बच्चे जले हुये छाछ की तरह लगते हैं
हम सभी फूंक फूंक कर
पीने की आदत डाल लेते हैं