Wednesday, April 11, 2007

Har kavita nahin hoti aadmi ke baare mein (हर कविता नहीं होती आदमी के बारे में)

जीवित हथियार के बनने में
कई मृत परम्परायें होती हैं

जूतों के नुकीलेपन, चमक के पीछे
मरी हुई कई गायें होती हैं

एक समूचे आदमी के बनने में
अनगिनत पीढियों की गुप्त आराधनायें होती हैं

प्यार यूँ ही पैदा नहीं होता
दो जिस्मों की मासूम सदायें होती हैं

हर कविता नहीं होती आदमी के बारे में
कितने अपाहिजों की जीवित आत्मायें होती हैं

- अनिल पुष्कर "कवीन्द्र"

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