Thursday, December 6, 2007

Andon se choojon ki chaah mein (अण्डों से चूजों की चाह में)

पत्ते निश्चिंत हैं
फूल निश्चिंत हैं
शाखें निश्चिंत हैं

जड़ें गहरी चिंता में डूबती जा रही हैं
तने की छाल छूट रही है
भीतर शुष्कता की दीमक चूस गयी सांद्रता

हल्का सा हवा का झोंका आते ही
थरथराता हुआ दरख्त चड़चड़ाने लगता है

आक्रोश में दबी चीख किसी को सुनायी नहीं देती
परिंदों की दस्तक कंपकंपा देती है

दरख्त में अब भी
कुछ परिंदों के घोसले, अँडे
पीली कुम्हलायी पत्तियों में सुरक्षित हैं

और कितनी बार
अँडों से निकलने वाले चूजों की चाह में
वो ज़िन्दा रहेगा

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