Thursday, April 12, 2007

Hamaari bhaasha mein jise pyaar kehte hain (हमारी भाषा में जिसे प्यार कहते हैं) - 1

हर कोई बच्चे को
सिखाना चाहता है नाम
बच्चा उसे दोहराते हुये
उच्चारण करता है

सभी उसकी गलतियों को
भूल जाते हैं मुआफी के लिहाज से

रटे रटाये शब्दों से ही वो
निकालता है अपना काम
गिने चुने नामों से ही छाँटकर
रख लेता है एक नाम
जिसमें ज्यादा से ज्यादा सुविधा
और छिपा होता है फायदा

हमारी भाषा में जिसे प्यार कहते हैं
वह बच्चे की मासूम चतुर दुनिया है

जिस तरह लाटरी लेकर ग्राहक
नंबर भूलने की गलती नहीं करता
बच्चा मीठी सेवैंया खाकर
उसका स्वाद नहीं भूलता

बच्चे हमारी दुनिया से
बिलकुल अलग हैं
बेहद खुश उत्कंठित
सादगी से भरपूर जिज्ञासु

अक्सर हम उनकी दुनिया में
अपनी इच्छाओं के रंग भरते हैं

बच्चा कच्चे दूध सा
पवित्र होता है
जिसे हम खीर बनाने की चेष्टा करते हैं

ज़रा सा संतुलन बिगड़ते ही
बच्चे जले हुये छाछ की तरह लगते हैं
हम सभी फूंक फूंक कर
पीने की आदत डाल लेते हैं

Wednesday, April 11, 2007

Har kavita nahin hoti aadmi ke baare mein (हर कविता नहीं होती आदमी के बारे में)

जीवित हथियार के बनने में
कई मृत परम्परायें होती हैं

जूतों के नुकीलेपन, चमक के पीछे
मरी हुई कई गायें होती हैं

एक समूचे आदमी के बनने में
अनगिनत पीढियों की गुप्त आराधनायें होती हैं

प्यार यूँ ही पैदा नहीं होता
दो जिस्मों की मासूम सदायें होती हैं

हर कविता नहीं होती आदमी के बारे में
कितने अपाहिजों की जीवित आत्मायें होती हैं

- अनिल पुष्कर "कवीन्द्र"